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वीर कुंवर सिंह ऐसा योद्धा जिन्होंने झुका दिया था अंग्रेजो को | Veer Kunwar Singh Biography In Hindi

वीर कुंवर सिंह ऐसा योद्धा जिन्होंने  झुका दिया था अंग्रेजो को | Veer Kunwar Singh Biography In Hindi

In : Meri kalam se By storytimes About :-2 months ago
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देश में 1857 की क्रांति में कई देश भक्त हुए जिन्होंने देश की आजादी की लोह जलाई और देश की आजादी के लिए अपने जीवन का बलिदान दिया 1857 क्रांति में एक वीर योद्धा थे वीर कुंवर सिंह जो एक वीर योद्धा होने के साथ साथ एक सच्चे देश भक्त थे कुंवर जब 80 वर्ष की उम्र के पड़ाव में थे तब उन्होंने देश भक्ति का जोश दिखा कर अंग्रेजो को इस बात का अहसास दिला दिया था की वो अब भारत में ज्यादा दिन नहीं टिक सकते

जब गुलाम भारत की आजादी के लिए लड़ाई लड़ी जा रही थी तब वीर कुंवर सिंह ने 23 अप्रैल, 1857 अपने देशभक्ति भक्ति का साहस दिखाते हुए भोजपुर के आरा जिले के जगदीशपुर में अंग्रेजो के पसीने छुड़ा दिए थे उन्होंने जगदीशपुर में ब्रिटिश यूनियन के फ्लैग को हटाकर अपना  फ्लैग लहराया था उनके इस देश भक्ति के साहस के कारण आज 23 अप्रैल के दिन को पूरा देश शौर्य दिवस  के रूप में मनाता है

देश में स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में अपनी वीरता का शौर्य  दिखाने वाले बाबू वीर कुंवर सिंह को आज स्वतंत्रता संग्राम के प्रथम महानायक के रूप में जाना जाता है जब भारत में अंग्रेज राज था तब साल 1857 की क्रांति के समय वीर कुंवर सिंह ने रीवा के किसान जमीदारो के अंदर अंग्रेजो के खिलाफ एक आजादी की अलख पैदा की और उन्होंने उनको अंग्रेजो के साथ लड़ाई के लिए तैयार किया और इस में विजय भी हासिल की

जब आजादी की लहर पुरे भारत में चल रहती थी चारो और इसकी लड़ाई लड़ी जा रही थी तब देश के बड़े स्वतंत्रता नायक तात्या टोपे रानी लक्ष्मी बाई, नाना साहब , बेगम हजरत अंग्रेजो से अपने राज्यों की आजादी की लड़ाई लड़ रहे थे और उसी दौर में बाबू वीर कुंवर सिंह ब्रिटिश शासन के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे थे उन्होंने अपने बल का परिचय तब दिया जब उन्होंने दानापुर में क्रांतिकारियों का बड़ी कुशलता से विरोधियो का सामना दिया तो चलिए दोस्तों जानते है बाबू वीर कुंवर सिंह के जीवन के बारे में

बाबू वीर कुंवर सिंह का जन्म व परिवार | Veer Kunwar Singh Birth And Family

1857 की क्रांति के देशभक्त और वीर योद्धा बाबू वीर कुंवर सिंह का जन्म बिहार के भोजपुर जिले के जगदीश पुर गांव में सन 1777 में एक उज्जैनिया के राजपूत परिवार में हुआ इनके पिता का नाम बाबू साहबजादा और माता का नाम रानी पंचरतन देवी था इनके पिता भोजपुर जिले उज्जैनिया की रियासत के शासक थे

साल 1826 में जब इनके पिता का देहांत हो गया तब इन्हे जगदीशपुर के तालुकदार के रूप में नियुक्त किया गया उनके भाई थे हरे कृष्णा और अमर सिंह जिन्हें सिपहसालार के पद दिए गए जब अंग्रेजो के खिलाफ कुंवर सिंह ने लड़ाई लड़ी थी तब इन दोनों भाइयो ने भी इनका पूरी शक्ति के साथ उनका साथ निभाया था

एवं उनके परिवार के सदस्य गजराज सिंह, उमराव सिंह और बाबू उदवंत सिंह जो उनके साथ इस आंदोलन में उनके साथ और देश की गुलामी की जंजीरो से मुक्त करने वाले इस आंदोलन में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया था

राजपूत राजघराने में जन्म लेने के कारन बाबू कुंवर सिंह के पास अपनी एक बड़ी रियासत थी और वे अपने क्षेत्र के एक बड़े जमींदार भी थे लेकिन जब देश में ब्रिटिश सरकार की गलत नीतियां चल रही थी इसके कारण उनसे उनकी रियासत का बड़ा हिस्सा छीन लिया गया था और इसके चलते कुंवर सिंह का अंग्रेजो प्रति आक्रोश और बढ़ गया था

देश को गुलामी की जंजीरो से मुक्ति दिलाने में की ललक उनके अंदर बचपन से ही थी उनका मन ज्यादातर शौर्य से जुड़े कार्य में ही लगता था

इनका विवाह फतेह नारायण सिंह जो एक मेवारी के सिसोदिया राजपूताना के शासक थे इनकी पुत्री से हुआ था यह बिहार जिले में एक बड़े जमींदार और मेवाड़ के शूरवीर महाराणा प्रताप के वश के थे

अंग्रेजो के विलय नीति का किया विरोध | Veer Kunwar Singh  History In Hindi

जब देश में बिट्रिश राज के दौरान साल 1848 – 49  में शुरु की गई विलय नीति के कारण कई भारतीय शासक उनकी इस हरकत को देख घबरा गए थे तब एकमात्र शासक बाबू कुंवर सिंह ही थे जो अंग्रेजो की इस नीति के खिलाफ उनके सामने उतर गए थे और उनकी इन नीतियों को रोकने के लिए उस समय हिन्दू और मुसलमान एक साथ हो गए थे

अंग्रेजो की दमनकारी नीतियों के चलते देश के किसान वर्ग भी काफी परेशान था और सभी राज्यों के राजा अपनी प्रजा के साथ अंग्रेजो की नीतियों के खिलाफ उतर आये थे और तब बिहार की दानापुर रेजिमेंट और रामगढ़ के सिपाहियों ने मिलकर अंग्रेजो के ऊपर हमला बोल दिया था 

बिहार के जवानो का हौसला देख तब खनऊ, इलाहाबाद, कानपुर मेरठ और दिल्ली में अंग्रेजो के खिलाफ भरी विरोध छिड़ गया तब कुंवर सिंह ने अपनी शौर्यता दिखाते है इसकी कमान संभाली और अंग्रेजो को उनकी नीतियों के खिलाफ घुटने टेकने के लिए मजबूर कर दिया 

80 की उम्र में मनवाया बाहदुरी का लोहा

जब पुरे भारतवर्ष में साल 1857 में आजादी की क्रांति की एक लहर चल रही थी देश के सभी राज्य के शासक अंग्रेजो की नीतियों का पुरजोर विरोध कर रहे थे तब बाबू कँवर सिंह अपने जीवन के अंतिम दौर में जी रहे थे उनकी उम्र 80 साल हो गई थी तब उनके पास इस आंदोलन का नेतृत्व करने का एक पत्र  आया उन्होंने इस पत्र को बिना पढ़े इसके लिए हा कर दी उनको बचपन से गुलामी की जंजीरो से देश को आजाद करने की कसक थी और वो गुस्सा उनके देशभक्ति के रस में अभी दौड़ रहा था और अपनी उम्र को पछाड़कर उन्होंने बड़ी शौर्यता से अंग्रेजो के खिलाफ मोर्चा संभाला

उन्होंने इस दौरान अंग्रेजो कार्यलयो पर हमला कर ध्वस्त कर दिया उनके खजाने में सेंध मारी और साथ ही उनके गांव में अंग्रेजो के झंडे को उतार अपना खुद का झंडा फहरा कर अंग्रेजो के पसीने छुड़ा दिए थे

इस आंदोलन के दौरान जब वो अपने साथियो के साथ गंगा नदी को पार कर थे तब ईस्ट इंडिया के सेनिको ने धोखे से घेर लिया और उन पार गोलिया बरसा दी तब एक गोली बाबू कुंवर सिंह के हाथ पर लग गई तब उन्होंने इसे अपना अपमान समझा और उन्होंने अपनी तलवार निकाल कर हाथ काट लिया और वो हाथ गंगा में बहा दिया और एक हाथ से ही अंग्रेजो से लड़ते रहे

काफी देर तक उन्होंने अंग्रेजी सेना का सामना करने के कारण वो बुरी तरह घायल हो गए उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और उम्र की अंतिम समय में वो काफी बीमार हो गए और 26 अप्रैल 1858 को उन्होंने अंतिम सांस ली

देश की आजादी की लड़ाई लड़ने वाले बाबू कंवर सिंह आज भी पहले स्वतंत्रता संग्राम के प्रथम सेनानी के रूप में जाने जाते है हम सभी उनके देशभक्ति और बलिदान को नमन करते है

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