x

क्रांतिकारी विजयसिंह पथिक की जीवनी | Vijay Singh Pathik Biography in Hindi

By N.j / About :-2 years ago

विजयसिंह पथिक उर्फ़ भूपसिंह गुर्जर जीवन संघर्ष | Vijay Singh Pathik Life Story In Hindi 

  • नाम - विजय सिंह पथिक
  • अन्य मशहुर  नाम - भूप सिंह गुर्जर, राष्ट्रीय पथिक
  • जन्म दिनांक - 27 फ़रवरी 1882 
  • जन्म स्थान- ग्राम गुठावली, जिला बुलन्दशहर, ब्रिटिश भारत
  • पिता का नाम - हमीर सिंह गुर्जर
  • माता का नाम -  कमल कुमारी
  • पत्नी का नाम - जानकी देवी
  • राष्ट्रीयता - भारतीय
  •  मृत्यु - 28 मई 1954 

विजयसिंह पथिक का परिवार | Vijay Singh Pathik Family

दोस्तों विजयसिंह पथिक एक प्रसिद्ध क्रांतिकारी थे। विजय पथिक का सही नाम भूपसिंह था। इनका जन्म उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले के एक गांव घुठावली में एक गुर्जर परिवार में हुआ था। जवानी में इनका शरीर काफी बलशाली था ये लंबे कद सवाले  रंग व इनके शरीर पर चेचक के दाग थे विजयसिंह को खड़ी बोली की कविताये लिखने का काफी शोक था। विजयसिंह पथिक ने किशनगढ़ एवं अजमेर में लोको-वर्क की दुकान पर काम किया था। यहाँ  से नौकरी छोड़ने के बाद वो खरवा आ गए और वहा राव साहब के निजी सचिव पद पर नियुक्त हो गए।

विजयसिंह पथिक द्वारा बिजोलिया आंदोलन का नेतृत्व | Bijoliya Aandolan by Vijay Singh Pathak

साल 1915 में जब राव साहब को अंग्रेजो ने टॉटगढ़ में नजरबंद कर लिया था तब विजयसिंह भी राव साहब के साथ थे। और उन्हें में राव साहब के साथ कैद कर लिया गया था। विजयसिंह ने यहां से फरार होने का प्लान बनाया और वो इसमें सफल भी हुए वो यहां से भागने के बाद मेवाड़ में घुस गए उसी दौरान विजयसिंह पथिक की मुलाकात सीताराम दास से हुई। सीताराम दास के बोलने पर ही विजयसिंह पथिक ने बिजौलिया आंदोलन की कमान संभालने का जिम्मा लिया था। विजय सिंह के इस फैसले ने कई किसानो का हौसला बड़ा दिया था। उस समय जागीदारो द्वारा किसानो की भारी ऋण ने कमर तोड़ रखी थी। उस समय बिजोलिया आंदोलन का शुरू करने का प्रमुख उदेश्य ही यही था की किसानो पर हो रहे  अत्याचारों के विरुद्ध आवाज उठाना । 1913 में बिजोलिया आंदोलन का नेतृत्व कर रहे सीताराम दास व किसानो ने भूमि कर देने से इनकार कर दिया। और पुरे एक वर्ष के लिए कोई खेती नहीं की। सन 1915 में साधु सीताराम चित्तौरगढ़ चले गये। वह पर जा कर उन्होंने विजयसिंह पथिक से बात की और बिजौलिया जागीदारो के द्वारा किसानो पर किये गये अत्याचार की पूरी कहानी सुनाई और सीताराम दास ने विजयसिंह पथिक को इस आंदोलन का नेतृत्व करने का अनुरोध किया। ऐसा करने के लिए विजयसिंह पथिक ने सीताराम दास को मना कर दिया। सन 1916 में किसानो पर हो रहे अत्याचार और अन्याय के विरुद्ध एक "किसान पंच बोर्ड" की स्थापना की गई और उसका अध्यक्ष सीताराम दास को बनाया गया। इस बार विजयसिंह पथिक के कहने पर  किसानो को ऋण देने से इनकार कर दिया।

कानपुर से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र ने दी आंदोलन को नई ताकत |  Vijay Singh Pathik Information In Hindi 

बिजौलिया ठाकुर ने इस आंदोलन को दबाने के लिए दमनकारी साधनो का सहयोग लिया। और हजारो किसानो को पकड़कर जेलों में भर दिया इनमे साधू सीतारमा दास , रामनारायण चौधरी और माणिक्यलाल वर्मा को भी जेल में डाल दिया गया। इस दौरान विजयसिंह पथिक वहां से भागकर कोटा राज्य की सीमा पर चले गये और वही से इस आंदोलन का संचालन करने लग गये। विजयसिंह ने कानपुर से प्रकाशित होने वाले समाचार पत्र के जरिये बिचौलिया किसान आंदोलन को पुरे देश में एक चर्चा का विषय बना दिया।  धीरे-धीरे इस आंदोलन ने आग पकड़ ली  और ये मेवाड़ और अन्य जगीरो था राज्यों के किसानो पर भी पड़ने लग गया। इसे देखकर ब्रिटिश अधिकारी हरकत में आ गये। इस आंदोलन से रूस में हुए "बोल्शेविक आन्दोलन" की एक छवि दिखाई देने लगी थी। इस करना मेवाड़ में स्थित ब्रिटिश रेजीमेंट ने इस आंदोलन को खत्म करने की सलाह दी।  साल 1920 में नागपुर कांग्रेस अधिवेशन के मोके पर  विजयसिंह पथिक , माणिक्यलाल वर्मा , साधू सीतारामदास आदि नेताओं ने महात्मा गाँधी जी एव अन्य कांग्रेसी नेताओ से मुलाकात कर किसानो पर हो रहे अत्याचारो के बारे में बताया। 

सन 1920 में महात्मा गाँधी के प्रतिनिधित्व में कांग्रेस ने असहयोग आंदोलन की शुरुआत कर दी। इस आंदोलन की शुरुआत से भारत सरकार के लिए एक समस्या उत्पन्न हो गई। मेवाड़ राज्य सरकार ने, बिजौलिया जागीदार के नेतृत्व में "राजस्थान सेवा संघ" के अधिकारियो ने इस वार्ता में भाग लिया अंत में जाकर फ़रवरी 1922 में एक समझौता हुआ इस समझौते के अनुसार किसानो की कई मांगे पूरी की गई, कई तरह के करो को हटा दिया गया और लगान की मांग को भी कम कर दिया गया। बेकार की प्रथा को भी खत्म कर दिया। और साल 1922 में इस आंदोलन को समाप्त कर दिया गया।

विजयसिंह पथिक को आंदोलन के दोरान हुई सजा | Vijay Singh Pathik

मेवाड़ की सरकार ने बेगू किसान आंदोलन में पथिक को बंदी बना कर साढ़े तीन साल की सजा दे दी गई। सन 1923 से ले कर 1926 तक के साल किसानो के लिए काफी मुश्किल साबित हुए। सन 1926 में ब्रिटिश अधिकारी ट्रेंच ने भूमि बंदोबस्त को लागु किया और पीवल क्षेत्रों में लगान की ड्रॉ को कम कर दिया लेकिन साथ ही बारानी क्षेत्रो में कर का दर काफी बढ़ा दिया। सन 1927 में किसान पंचायत की बैठक हुई जिसमे रामनारायाण चौधरी और माणिक्यलाल वर्मा भी उपस्थित हुए । 

इस दौरान बारानी क्षेत्रो को छोड़ने पर विचार - विमर्श हुआ। इस दौरान विजयसिंह पथिक जेल से रिहा हो गये। पथिक ने किसानो को सुझाव दिया की हमें इस आंदोलन को अहिंसात्मक तरीको से इस आंदोलन को आगे ले जाना होगा। पथिक को इस बात का विश्वास था की किसानो द्वारा छोड़ी गई भूमि को किसान नहीं ख़रीदेगा और बाद में विवश हो कर लगान को कम करना पड़ेगा। लेकिन जागीदारो ने बारानी भूमि बढ़े हुए कर के साथ नए किसानो को दे दी।

21 अप्रेल 1931 को 400 ने लड़ी हक़ की लड़ाई | Vijay Singh Pathik  History

बाद में क्या था किसानो द्वारा अपनी समर्पित बारानी भूमि वापिस लेने के लिए आंदोलन करने का निश्चय कर लिया और 21 अप्रेल 1931 को 400 से भी ज्यादा किसानो ने अपनी भूमि पर हल चलना शुरू कर दिया। ऐसा होते देख सेना पुलिस, और नए किसान, किसानो पर टूट पड़े। इस दौरान कुल 200 किसानो को बंदी बना लिया गया इस घटना का पूरा वर्णन हरिभाऊ उपाध्याय जी ने गाँधी जी को किसानो पर हो रहे अत्याचार का पूरा लेख भेजा। इस पर गाँधी जी ने गाँधी जी ने उदयपुर के दिवान पर सुखदेव प्रसाद को एक पत्र लिख कर भेजा और इस समस्या का हल करने का अनुरोध किया। और अब बिजौलिया आंदोलन एक बड़ा रूप धारण कर चूका था।

1941 में मेवाड़  के दिवान टी.विजय राघवाचार्य ने राजस्व मंत्री डा.मोहनसिंह मेहता को बिजौलिया के लिए भेजा और वहां जा कर उन्होंने किसान नेताओ और अन्य नेताओ से बात कर किसानो की समस्या का हल करवाया और किसानो को उनकी जमीनें दी गई और इस प्रकार इस आंदोलन का किसानो के हित में समापन हुआ।

क्रांतिकारी विजयसिंह पथिक की जीवनी | Vijay Singh Pathik Biography in Hindi